Al-Risala · July 2023 · page 7

ख़ुदा का सबूत

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۳، صفحہ ۷

আপনার याद दिलाना चाहता हूँ कि बामक़सद हान का मतलब सिफ़्र यह नहाँ है कि एक मक़सदी या एक उद्देशयपूर्ण कल्पना आपके ज़ेहन में पाई जा रही हो। कुछ तक़रीरों को सुन कर या कुछ तहरीरों को देख कर एक मक़सदी नज़रिया किसी के दिमाग़ में पहुंच जाए तो सिर्फ़ इस बिना पर उसको बामक़सद इन्सान नहीं कहा जा सकता। बामक़सद इन्सान तो वही होता है जो अपने पूरे वजूद के साथ बामक़सद बन गया हो, जिसकी ज़िन्दगी उसके मक़सद में इस तरह ढल जाए कि दोनों के बीच कोई दूरी बाक़ी न रहे। आप इस वक़्त एक मस्जिद में बैठे हैं, जिसके ऊपर ऊंचे-ऊंचे मीनार खड़े हैं। अगर हवा के ज़रिए कुछ आम के पत्ते उड़ कर आएं और इन मीनारों पर अटक जाएं तो इससे आप इन मीनारों को आम दरख़्त नहीं कहने लगेंगे। आम का दरख़्त तो वही है, जो अपनी जड़ में भी आम हो, अपने तने में भी आम हो, अपनी शाखों में भी आम हो, अपने पत्तों में भी आम हो और वह आम ही के फल दें। आम का दरख़्त आप उसको कहते हैं, जो इस तरह ऊपर से नीचे तक आम हो। महज़ किसी लम्बी खड़ी हुई चीज़ पर आम जैसी लगने वाली चीज़ों का इत्तिफ़ाक़ से जमा हो जाना उसको हरगिज़ आम नहीं बना देता। इसी तरह आपको भी बामक़सद इन्सान उसी वक़्त कहा जा सकता है जब आप सिर से पांव तक अपने पूरे वजूद में बामक़सद बन गए हों। महज़ कुछ नज़रियातों का कहीं से आकर आपके जेहन में अटक जाना आपको बामक़सद नहीं बना देता। इस्लाम ज़िन्दगी का एक मक़सद है और हम उसी वक़्त

‹ Previous page Next page › Contents of July 2023 All issues

Printed page