Al-Risala · July 2023 · page 14

ख़ुदा का सबूत

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۴

वह अमल जो हक़ीक़त में 'दाइयाना' जज़्ब के तहत निकलता है और वह अमल जो पारम्परिक तौर पर या महज़ ड्यूटी अंजाम देने के लिए किया जाता है, दोनों में बड़ा फ़र्क़ है। एक हक़ीक़त है और दूसरा हक़ीक़त की नक़ल। एक जगह बात सिर्फ़ मुंह से निकलती है और दूसरी सूरत में जब आदमी बोलता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसने अपने कलाम में अपनी पूरी शख़्सियत को उंडेल दिया है। एक सूरत में आदमी का अमल सिर्फ़ एक लगी-बंधी कार्रवाई नज़र आता है और दूसरी सूरत में उसका अमल उसके बेताब जज़्बात का इज़हार होता है। एक सूरत में आदमी की तमाम ज़िन्दगी उसके मक़सद में डूबी हुई होती है और दूसरी सूरत में कुछ मक़सदनुमा हिस्से उसकी ज़िन्दगी के साथ इस तरह इधर-उधर अटके हुए होते हैं जैसे किसी मीनार में आम के कुछ पत्ते। यह ख़तरा हर उस गिरोह को है जो एक मक़सद को लेकर उठे और उस पर उसको पच्चीस-पचास साल गुज़र जाएं। लेकिन याद रखिए कोई गिरोह उसी वक़्त तक मक़सदी गिरोह है जब तक हक़ीक़त में वह मक़सदी तड़प के तहत काम कर रहा हो। उसके बाद जब उसकी गाड़ी उससे उतर कर पारंपरिक डगर पर चल पड़े, जब उसकी सरगर्मियां बेताब जज़्बात के इज़हार के बजाए घिसी-पिटी कार्रवाई बन कर रह जाएं तो वह तहरीक के बजाए रस्म और जमाअत के बजाए अंजुमन बन जाती है, इसके बाद भी हालांकि वह एक बामक़सद गिरोह दिखाई देता है। मगर मक़सदी हैसियत से अब वह मर चुका होता है। वह बामक़सद इन्सान नहीं होता बल्कि गुज़रे हुए बामक़सद इन्सानों की लाश होती

‹ Previous page Next page › Contents of July 2023 All issues

Printed page