Al-Risala · September 2023 · page 3

एक आज़माइश

الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۳، صفحہ ۳

किसी इन्सान के लिए इस तरह की तबाहकुन स्थिति क्या आती है? इसका कारण उसका यही स्वभाव है। वह जब एक बार किसी चीज़ को अपना लेता है तो इसके बाद ऐसा होता है कि उस एक चीज़ के अलावा दूसरी तमाम चीज़ें अपने आप उसके लिए ओझल (आउच ऑफ फ़ोकस) हो जाती हैं। वह मौजूद होते हुए भी उसके अपने लिए ऐसी बन जाती हैं जैसे कि वे मौजूद ही न हों। अब आदमी की सारी दिलचस्पी उसकी अपनी अपनाई हुई चीज़ से हो जाती है। अपने विशिष्ट प्रनोविज्ञान के कारण वह इस बनावटी विश्वास में पड़ जाता है कि वह मामले का सिरा पकड़े हुए है। हालांकि उसके हाथ में सिर्फ़ एक ऐसा बेक़ीमत तिनका होता है, जो तूफ़ान के पहले ही झटके में उससे अलग हो जाए। इसीलिए क़ुरआन में कहा गया है कि हर इन्सान अपने ढंग (तरीके) पर अमल करता है और अल्लाह ही बेहतर जानता है कि कौन शख्स ज़्यादा सही रास्ते पर है (बनी इसराईल 84)। इस आयत से यह बात मालूम होती है कि ऐसा हो सकता है कि एक शख़्स अपने निजी तौर-तरीक़े में अपने आपको पूरी तरह सच्चा समझे पर वह अल्लाह की नज़र में सच्चा न हो। ऐसे लोग आख़िरत में बेक़ीमत हो कर रह जाएंगे। इन्सान की यह पैदायशी कमज़ोरी जिस तरह आम इन्सान के लिए घातक है उसी तरह वह मुस्लिम समाज के लोगों के लिए भी 'फ़ितना' है। इस आम आज़माइश के मामले में मुसलमान अपवाद नहीं। मुसलमानों के बीच भी ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग दीन के एक पहलू को लेकर उसको अपने ध्यान का केन्द्र बना लें और फिर दीन के दूसरे तमाम तक़ाज़े उनके फ़ोकस से बाहर

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