Al-Risala · September 2023 · page 5

एक आज़माइश

الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۳، صفحہ ۵

नहीं पहुँच सकता, जब तक उसका यह हाल न हो जाए कि वह (कभी कभी) ऐसी चीज़ों को भी छोड़ दे, जिसमें हर्ज़ नहीं है, इस अन्देशे की वजह से कि शायद इसमें हर्ज़ हो। हज़रत उमर के उस मामले को भी इसी हदीस के तहत देखना चाहिए। अगर दुनिया की अच्छी चीज़ों को ज़रूरी तौर पर क़ाबिले तर्क समझा जाए तो यह नज़रिया क़ुरआन की उन आयतों से टकरा जाएगा, जिनमें अच्छी और पाक चीज़ों को साफ़ तौर पर ईमान वालों के लिए जायज़ बताया गया है। यहां तक कि कहा गया है कि कहो, अल्लाह की 'ज़ीनत' (शोभा) को किसने हराम ठहराया है, जो उसने अपने बन्दों के लिए पैदा की हैं और खाने की तय्यब (पाक) चीज़ें। कहो कि वे दुनिया की ज़िन्दगी में भी ईमान वालों के लिए हैं और आख़िरत में तो वे ख़ास उन्हीं के लिए होंगी (अल-आराफ़ 32)। मानवीय गुण कुरआन में मामूली लफ़्ज़ी फ़र्क के साथ दो जगहों पर यह बात कही गई है कि अल्लाह किसी क़ौम की हालत को उस वक़्त तक नहीं बदलता जब तक कि वह उसको न बदल डाले जो उसके जी में है (अर रअद)। इस खुदाई सुन्नत से मालूम होता है कि किसी गिरोह के क़ौमी और इज्तिमाई हालात उसके वैयक्तिक हालात पर निर्भर हैं। इसको दूसरे लफ़्ज़ों में इस तरह कहा जा सकता है कि क़ौमी हैसियत का दारोमदार मानवीय गुणों पर है। किसी क़ौम के लोगों में इन्सानी या अख़्लाक़ी या नैतिक खूबियां जैसी होंगी, उसी

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