एक आज़माइश
الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۳، صفحہ ۶
ही इसका वजह से उनका ताक़त बहुत बढ़ जाता ही व हर मामिल मँ गैरमामूली तौर पर कामयाब रहते हैं। जापान की इस एकता का राज़ वहां के लोगों का वैयक्तिक स्वभाव है, जो तक़रीबन तमाम जापानियों के अन्दर पाया जाता है। प्रोफ़ेसर ची नकानी (Chie Nakane) की जापानी भाषा में एक किताब है, जिसका तर्जुमा अंग्रेजी में जापानी समाज (Japanese Society) के नाम से छपा है। इस किताब में जापानी प्रोफ़ेसर ने लिखा है कि जापानी का वैयक्तिक मिज़ाज यह होता है कि वह समझता है कि मैं किसी के मातहत हूं। I am under someone. दूसरे लफ़्ज़ों में यह कि हर जापानी अधीनता-भाव में जीता है। इसलिए जब भी कोई सामूहिकिता कायम होती है तो वह फ़ौरन उससे जुड़ जाता है। वह तन्ज़ीम यानी संगठन के नेता को फ़ौरन अपना नेता मान लेता है, क्योंकि वह पहले ही से यह माने हुए था कि मैं किसी के मातहत हूं - यह है जापानियों की उस एकता का राज़ जिसके नतीजे में उन्होंने मौजूदा ज़माने में अप्रत्याशित तरक्की की है। अब मौजूदा ज़माने के मुसलमानों को देखिए। मुसलमानों का मामला जापानियों के बिल्कुल बरअक्स है। मसजिद से लेकर सियासत तक कोई मामला ऐसा नहीं, जिसमें मुसलमान मुत्तहिद या एक हों। मौजूदा मुसलमान दुनिया की सबसे ज़्यादा बरबाद कौम हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह बेशक
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