Al-Risala · September 2023 · page 7

एक आज़माइश

الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۳، صفحہ ۷

मौजूदा ज़माने में जब मुसलमान पस्ती, मग़्लूबियत और पतन का शिकार हुए तो उनके रहनुमाओं की तश्खीस (मर्ज़ की जांच) यह थी कि पश्चिम के प्रभाव में आ जाने से उनको पस्ती से दो-चार किया। इसलिए तमाम रहनुमाओं ने एक या दूसरी सूरत में यह किया कि इस्लाम को गर्वपूर्ण अन्दाज़ में पेश करना शुरू कर में दिया, ताकि उनके प्रभुत्व को ख़त्म कर सकें। इसका नतीजा यह है कि मुसलमानों की पूरी नस्ल गर्व और हाकिमियत (शासकत्व) के एहसास पर परवरिश पा कर उठी है। हर आदमी नज़रिए और आस्था के लिहाज़ से अपने अन्दर बरतरी और बढ़प्पन का जज़्बा लिए हुए है। क्योंकि यही जज़्बा उसके अन्दर उभारा गया था। यह मानसिकता एकता की क़ातिल है। एकता उस वक़्त क़ायम होती है जबकि एक शख़्स को बड़ा बना कर बाक़ी तमाम लोग उसके मुक़ाबले में छोटे बनने पर राज़ी हो जाएं। मगर मुसलमानों की गर्व की मानसिकता इसमें रुकावट है। इसका नतीजा यह है कि अब हर आदमी सरदार बनना चाहता है। हर आदमी चाहता है कि उसकी बात चले। हर आदमी चाहता है कि हाकिमाना सीट पर बैठे। ऐसी हालत में एकता कायम होना मुमकिन नहीं। और मुसलमानों की यही वह मानसिकता है, जिसने आज उनके दरम्यान किसी भी एकता को سراسر नामुमकिन बना दिया है। मौजूदा ज़माने के मुसलमानों का अस्ल मसला सत्ता को खोना नहीं, बल्कि इन्सानी गुणों को खोना है। मौजूदा मुसलमान अपने रहनुमाओं और लीडरों की ग़लत रहनुमाई के नतीजे में ऊंचे मानवीय गुणों से खाली हो गए हैं। अब सबसे पहला ज़रूरी काम यह है कि मुसलमानों के अन्दर वे गुण पैदा किए जाएं जो

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