عورت کا میدانِ کار
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۳، صفحہ ۸
इसक बाद नजाशी न हुक्म दिया कि मक्का के जो मुसलमान हमारे मुल्क में आए हैं, उनको मेरे दरबार में हाज़िर किया जाए। वे लोग लाए गए। वे लोग दरबार में दाखिल हुए तो उन्होंने वहां के आम तरीके के मुताबिक बादशाह को सज्दा नहीं किया। नजाशी एक ईसाई बादशाह था। अपने अक़ीदे के मुताबिक वह हज़रत ईसा को ख़ुदा का बेटा मानता था। मगर बातचीत के दौरान जब हज़रत ईसा का ज़िक्र हुआ तो सहाबियों के नुमाइन्दे जाफ़र बिन अभी तालिब ने साफ़ कह दिया कि वह ख़ुदा के पैग़म्बर थे, वह ख़ुदा के बेटे न थे। वग़ैरह । नजाशी ने पूरी बात मालूम करने के बाद प्रतिनिधि मंडल के अनुदान और तोहफ़े वापस कर दिए। उसने उनसे कहा कि तुम लोग अपने मुल्क लौट जाओ। मैं इन मुसलमानों को हरगिज़ तुम्हें सौंपने वाला नहीं। वे मेरे मुल्क में जब तक चाहेंगे रहेंगे (सीरत इब्ने कसीर, दूसरा हिस्सा, पेज 22) यही इन्साफ़ का सही तरीक़ा है। इन्साफ़ एक तरफा कार्रवाई का नाम नहीं। इन्साफ़ दो तरफा तहक़ीक़ के बाद न्यायपूर्ण फ़ैसला देने का नाम है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की प्रत्यक्ष पुष्टि के मुताबिक, नजाशी का अमल बेशक इन्साफ़ का ऊँचा नमूना है। हक़ीक़त यह है कि जब भी कोई ऐसा मसला सामने आए जो दो पक्षों से ताल्लुक रखता हो तो ऐसे मौके पर एक पक्ष की बात सुन कर फ़ैसला कर देना सरासर ज़ुल्म है। ऐसा करना किसी भी शख़्स के लिए दुरुस्त नहीं, चाहे वह कितने ही बड़े मन्सब और ओहदे पर क्यों न हो ।
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