عورت کا میدانِ کار
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۳، صفحہ ۹
हो नहा, उन्होंने बादशाह और सारा क़ौम के मज़हबी अक़ािदा का खंडन किया और उसको ग़लत बताया। इन सब प्रतिकूल पहलुओं के बावजूद नजारी ने किसी बात की कोई परवाह नहीं की। उसने मामले के सिर्फ़ अदल व इन्साफ़ के पहलू को देखा, दूसरे तमाम के निजी और ग़ैर-निजी पहलुओं को उसने सिरे से नज़रअन्दाज़ कर दिया। उसने दोनों पक्षों की बात सुन कर मामले की निष्पक्ष तहकीक की, और फिर जो इन्साफ़ का तक़ाज़ा था, उसके मुताबिक़ फ़ैसला सुना दिया। ये वाक़िआत यह साबित करते हैं कि शाह नजारी के अन्दर इन्सानियत का जज़्बा पूरी तरह मौजूद था। ख़ुदा ने जिस फ़ितरत पर उसको पैदा किया था, उस फ़ितरत को उसने अपनी अस्ल हालत पर बाक़ी रखा था। यही वजह है कि हक़ व सच्चाई जब उसके सामने आई, तो उसको समझने में उसे देर नहीं लगी। हालांकि ज़ाहिरी तौर पर वह उसकी धारणा के ख़िलाफ़ था, मगर उसने किसी लाग-लपेट के बिना और किसी पूर्वाग्रह के बिना उसकी सच्चाई का एतिराफ़ किया। वह फ़ौरन उसके आगे झुक गया। अपनी इन खुसूसियात की बिना पर वह इस काबिल ठहरा कि अल्लाह तआला उस पर रहमत की नज़र करे। उसको ईमान की तौफ़ीक़ दे कर उसको आख़िरत की हमेशा रहने वाली नेअमतों का मुस्तहक़ बनाए। रिवायातों से साबित है कि शाह नजारी ने इस्लाम क़बूल किया और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा ने उसके हक़ में अल्लाह तआला से ख़ास दुआएं कीं।
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