عیب خوانی، قصیدہ خوانی
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۴، صفحہ ۱
अहमद और इक़बाल दोनों एक ही शहर में रहते थे। अहमद बी.ए. पास था जबकि इक़बाल सिर्फ़ आठवीं क्लास तक पढ़ा था। एक बार इक़बाल को एक सरकारी दफ़्तर में जाना था। वह वहां जाने लगा तो अहमद भी उसके साथ चला गया। दोनों उस दफ़्तर में पहुंचे। अहमद ने देखा कि इक़बाल वहां खूब अंग्रेज़ी बोल रहा है। जब दोनों बाहर निकले तो अहमद ने कहा कि तुम बिल्कुल ग़लत-सलत अंग्रेज़ी बोल रहे थे। मैं तो कभी इस तरह बोलने की हिम्मत नहीं करूंगा। पर इक़बाल को अहमद की इस बात से कोई शर्मिन्दगी नहीं हुई। उसने पूरे विश्वास भरे लहजे में कहाः “ग़लत बोलो ताकि तुम सही बोल सको।”
इक़बाल ने कहा कि तुम हालांकि बी.ए. हो और मैं कुछ भी नहीं हूं, मगर देख लेना कि मैं अंग्रेज़ी बोलने लगूंगा और तुम कभी भी न बोल सकोगे। इस बात को अब बीस साल हो चुके हैं। इक़बाल की बात सौ फ़ीसदी सही साबित हुई। अहमद आज भी वहीं है जहां वह बीस साल पहले था। मगर इक़बाल ने इस अर्से में ज़बरदस्त तरक़्क़ी की। वह अब बेझिझक होकर अंग्रेज़ी बोलता है और बहुत कम लोग ऐसे हैं जो उसकी बातचीत में भाषा की ग़लती पकड़ सकें। इक़बाल के इस हिम्मतती मिज़ाज ने उसको बहुत फ़ायदा पहुंचाया। इससे पहले शहर में उसकी एक मामूली दुकान थी, मगर आज उसी शहर में उसका एक बड़ा
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