शहद का सबक़
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۴، صفحہ ۸
का 'सियासी मज़हब' से कोई दिलचस्पी नहीं। वह 'रूहानी मज़हब' की तलाश में है। वह अपनी फ़ितरत में उठने वाली ख़ुदा की तड़प का जवाब चाहता है। अगर इस वक़्त आज के इन्सान के सामने इस्लाम को उसके सादा और स्वाभाविक रूप में पेश कर दिया जाए तो इन्सान महसूस करेगा कि यही वह चीज़ है, जिसको वह अपने अन्दरूनी तक़ाज़े के तहत तलाश कर रहा था।
शहद का सबक़
शहद की मक्खियां फूलों का जो रस जमा करती हैं, वह सब का सब शहद नहीं होता। उसका सिर्फ़ एक तिहाई हिस्सा शहद बनता है। शहद की मक्खियों को एक पौंड शहद के लिए बीस लाख फूलों का रस हासिल करना पड़ता है। उसके लिए मक्खियां क़रीब तीस लाख उड़ानें करती हैं और इस दौरान वह कुल मिलाकर क़रीब पचास हज़ार मील तक का सफ़र तय करती हैं। रस जब ज़रूरी मात्रा में जमा हो जाता है तो इसके बाद शहद बनाने का काम शुरू होता है। शहद शुरू-शुरू में पानी की तरह पतला होता है। शहद तैयार करने वाली मक्खियां अपने परों को पंखे की तरह इस्तेमाल करके अतिरिक्त पानी को भाप की तरह उड़ा देती हैं। जब यह पानी उड़ जाता है तो इसके बाद एक मीठा द्रव
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