16 جون 1986
الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۴، صفحہ ۸
आसमान के सितार एक अनदखी रस्सी में बंधु हुए हैं जो उन्हें उनके तयशुदा दायरे (Orbit) से बाहर नहीं जाने देती। इसी तरह इंसान को भी एक नैतिक (अख़लाकी) रस्सी में बांधा गया है। यह रस्सी सही और ग़लत की रस्सी है। उसको सही काम करना है पर ग़लत क़दम नहीं उठाना है। इंसान को इंसाफ़ पर क़ायम रहना है। उसको जुल्म और अत्याचार की इज़ाजत नहीं उसको जब बोलना है सच बोलना है। झूठ बोलना उसके लिए जायज़ नहीं। उसको अपनी तरक़्क़ी और कामयाबी के लिए प्रयत्नशील रहने की इजाजत है। पर उसको यह इजाजत नहीं कि वह दूसरों को नुकसान पहुंचाने की क़ीमत पर अपने लिए फ़ायदा हासिल करे। इस सत्य को एक चुटकुले द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। एक देश को बाहरी गुलामी से आजादी मिली। उसके बाद वहां का एक 'नागरिक सड़क पर निकला। वह खुशी से झूमता हुआ जा रहा था। और अपने दोनों हाथ ज़ोर-ज़ोर से हिला रहा था। इसी बीच उसका हाथ एक राहगीर की नाक से टकरा गया। राहगीर ने गुस्सा होकर पूछा कि तुम इस तरह हाथ हिलाते हुए क्यों चल रहे हो? उस नागरिक ने जवाब दिया: “आज मेरे देश को आज़ादी मिल चुकी है। अब मैं आज़ाद हूं कि जो चाहूं करूं।" राहगीर ने अहिस्ता स्वर में कहा:
“तुम्हारी आज़ादी वहां ख़त्म हो जाती है, जहां से मेरी नाक शुरू होती है।"
(Your freedom ends where my nose begins.)
‹ Previous page Next page › Contents of September 2024 All issues