Al-Risala · September 2024 · page 10

ख़ुदा की हिफ़ाज़त में

الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۴، صفحہ ۱۰

तातारियों न इस्लाम क़बूल कर लिया, उन्हान ढाई हुई मास्जिद का दोबारा तामीर किया और उन मस्जिदों में सज्दा करके ख़ुदा के सामने अपने इज्ज़ और खुदृता का इक़रार किया। उन्नीसवीं सदी के मध्य में मुग़ल साम्राज्य ख़त्म हुआ। बीसवीं सदी के आग़ाज़ में उस्मानी ख़िलाफ़त का ख़ात्मा हो गया। बज़ाहिर ऐसा मालूम हुआ कि अब मुसलमानों के लिए दुनिया में कोई मुस्तक़बिल और कोई भविष्य नहीं। मगर दूसरे विश्व-युद्ध के बाद लोगों ने देखा कि दुनिया के नक़्शे पर पचास से ज़्यादा आज़ाद मुस्लिम मुल्क वजूद में आ गए हैं। और तमाम इस्लामी सरगर्मियां नए सिरे से, नई ताक़त के साथ जारी हो गई हैं। मुसलमानों को उम्मते-मरहूमा और वंचित समाज कहा जाता है। यह बात सही नहीं, बल्कि मुसलमान उम्मते-महफ़ूज़ा (सुरक्षित उम्मत) हैं। यानी उनके अन्दर बिगाड़ के बावजूद उन पर मिटा देने वाला अज़ाब नहीं आएगा, और कोई कौम उन पर इसन क़ाबू न पा सकेगी कि वह उनको बिल्कुल मिटा दे। इसका सबब कोई फ़ज़ीलत (मुसलमानों की श्रेष्ठता) नहीं है। यह दुन्यवी हिफ़ाज़त मुसलमानों को पूरी तरह नबूवत की श्रृंखला के ख़त्म होने के कारण से हासिल हुई है। मौजूदा ज़माने में ख़ुदा की यह सुन्नत बहुत बड़े पैमाने पर ज़ाहिर हुई है। मौजूदा ज़माने में जो मुस्लिम रहनुमा उठे, उन्होंने अपनी ग़लत रहनुमाई से

‹ Previous page Next page › Contents of September 2024 All issues

Printed page