बोलने की सूझबूझ
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۴
तज़कलेमा का अन्दाज़ छान लेता है। आख़िरत का जवाबदेही का एहसास उसके बोलने के जोश के लिए रुकावट बन जाता है। जो शख़्स इस क़िस्म के सख़्त एहसासों से दबा हुआ हो वह आख़िरी हद तक संजीदा इन्सान बन जाता है। और संजीदा इन्सान की बातचीत का अन्दाज़ वही होता है, जिसका नक्शा हज़रत आयशा की ऊपर वाली روایت में नज़र आता है।
बोलने की सूझबूझ
रसूलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता हो उसको चाहिए कि बोले तो भली बात बोले वरना चुप रहे। ला ब्रूइयर (Jean de La Bruyere) एक फ्रांसीसी लेखक है। वह 1645 में पैदा हुआ और 1696 में उसकी मृत्यु हुई। उसने यही बात इन शब्दों में कही कि यह बड़ी बद्क़िस्मती की बात है कि आदमी के अन्दर न इतनी समझ हो कि वह अच्छा बोले और न इतनी निर्णय-शक्ति हो कि वह चुप रहेः It is a great misery not to have enough wit to speak well, nor enough judgement to keep quiet. बोलने की क्षमता एक महान् क्षमता है, जो अल्लाह तआला ने इन्सान को दी है। बोलने की क्षमता को अगर सही तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो वह नेमत है और
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