बोलने की सूझबूझ
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۵
करा जा ज़िम्मेदारी के एहसास के तहत बोल न कि बालन के शौक़ के तहत। इसके विपरीत बोलने की क्षमता का ग़लत इस्तेमा'माल यह है कि आदमी सोचे बग़ैर बोले; उसको सिर्फ़ सुनाने का शौक़ हो; सुनने से उसको कोई दिलचस्पी न हो; मामले को गहराई के साथ समझे बग़ैर मामले पर भाषण झाड़ने के लिए खड़ा हो जाए; उसका बोलना दिखावे के लिए हो न कि सच्चाई प्रकट करने के लिए। बोलना सबसे बड़ा सबाब (पुण्य) है और बोलना सबसे बड़ा गुनाह भी। जो आदमी इस हक़ीक़त को जान ले, उसका बोलना भी सार्थक होगा और उसका चुप रहना भी सार्थक। ज़ुबान और दिल सबसे अच्छे भी हैं और सबसे ख़राब भी लुक़मान हकीम एक हब्शी गुलाम थे। उनके आक़ा ने एक रोज़ उनसे कहा कि एक बकरी ज़िब्ह करो और उसमें से दो बेहतरीन गोश्त के टुकड़े निकालो। लुक़मान ने बकरी ज़िब्ह की और ज़ुबान और दिल निकाल कर आक़ा के सामने पेश किया। कुछ दिन के बाद आक़ा ने दोबारा कहा कि एक बकरी जिब्ह करो और उसमें से दो सबसे ज़्यादा ख़राब गोश्त के टुकड़े निकालो। लुक़मान ने बकरी ज़िब्ह की और दोबारा ज़ुबान और दिल निकाल कर आक़ा के सामने रख दिए। आक़ा ने कहा कि मैंने तुम से दो सबसे अच्छे टुकड़े निकालने के लिए कहा तो तुमने ज़ुबान और दिल निकाले और जब मैंने तुम से दो सबसे ख़राब टुकड़े निकालने के लिए कहा तब भी तुमने ज़ुबान और दिल निकाले। ऐसा क्यों? लुक़मान हकीम ने जवाब दिया: अगर
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