Al-Risala · November 2024 · page 6

बोलने की सूझबूझ

الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۶

तार पर आएँ मगर इतिहास बताता है कि कोई भी शख़्स ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब लाने में कामयाब न हो सका। तमाम मालूम इन्क़िलाब क़त्ल और ख़ून के जंगल को पार करके ही आए हैं। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का लाया हुआ इन्क़िलाब तमाम मालूम इतिहास का अकेला इन्क़िलाब है जो सही मानो में ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब (bloodless revolution) है। मुहम्मद (स.अ.व.) को अगर इतिहास से हटा दिया जाए तो न सिर्फ़ ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब की यह बात अफ़साना बन कर रह जाती है, बल्कि उसके बाद कोई ऐसी व्यावहारिक मिसाल बाक़ी नहीं रहती जिसकी रोशनी में कोई इन्सान बाद के ज़मानों में ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब की बात सोच सके। फ्रांस में आधुनिक लोकतांत्रिक इन्क़िलाब आया। इसमें जनता और राजतंत्र के बीच जो मुक़ाबले हुए उनमें मरने वालों की तादाद 10 लाख तक पहुंच गई। बीसवीं सदी में रूस में कम्यूनिस्ट इन्क़िलाब आया। उसमें जो लोग मरे और मारे गए उनकी ठीक-ठीक तादाद मालूम नहीं। फिर भी अन्दाज़ा है कि उनकी तादाद किसी हाल में एक करोड़ से कम नहीं। अमरीकी इन्क़िलाब (1773-1783) में इससे कुछ कम आदमी मरे। फिर भी इसमें मरने वालों की तादाद 50 हज़ार तक पहुंच गई। विश्व युद्धों का मामला इससे भी आगे है। पहले विश्व-युद्ध में विभिन्न मुल्कों के 75 लाख आदमी मारे गए। और दूसरे विश्व-युद्ध में छः करोड़ से ज़्यादा आदमी मरे। मुहम्मद (स.अ.व.) इस दुनिया से गए तो एक पूरे मुल्क में ज़बरदस्त वैचारिक और नैतिक इन्क़िलाब आ चुका था। आपकी वफ़ात के वक़्त 12 लाख वर्ग मील के क्षेत्र पर आपकी हुकूमत क़ायम थी। मगर इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ़ 1018 आदमी मरे,

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