بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۳
एहतराम (सम्मान) कर और उसम एक ख़ुदा के आगे सजदा करके अपना फ़रमाँबरदारी और निष्ठा कर इज़हार करें। यह रिसालत के दौर का वाक़िआ है। अब मौजूदा ज़माने के मुसलमानों को देखिए। 1831 में सय्यद अहमद शहीद बरेलवी को यह ख़बर मिली कि पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब की कुछ मस्जिदों को अस्तबल बना दिया है। वहां उसके घोड़े बंधे होते हैं। यह ख़बर सुनने के बाद उन्हें इसकी तहक़ीक़ करने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। वह बहुत से मुसलमानों को लेकर पंजाब पहुंचे और रणजीत सिंह की फौजों से लड़ गए। इस लड़ाई में हज़ारों मुसलमान मारे गए। एक तज़किरानिगार ने लिखा है कि पंजाब की ज़मीन मुसलमानों के ख़ून से लाल हो गई। 1857 के ग़दर (या आज़ादी की लड़ाई) में यह वाक़िआ हुआ कि मुसलमान इस बात पर भड़क उठे कि उन्हें हुक्मराजों की तरफ से ऐसे कारतूस दिए गए हैं, जिनमें सुअर की चर्बी लगी हुई है, या कुछ अंग्रेज़ सिपाही घोड़ों पर चढ़ कर किसी मस्जिद में दाख़िल हो गए हैं। इसके नतीजे में मुसलमानों ने अंग्रेज़ों से जो लड़ाई लड़ी, उसमें लाखों मुसलमान मारे गए। बेशुमार मुसलमानों का ख़ून बहा। मगर सब कुछ बेकार, क्योंकि जो सूरते-हाल थी वह बदस्तूर और भी शिद्दत के साथ बरक़रार रही। उस वक़्त से लेकर अब तक लड़ाई-भिड़ाई का सिलसिला जारी है। मुसलमान हर तरफ़ अपना ख़ून बहा रहे हैं। ग़ैर क़ौम का कोई शख़्स मस्जिद की दीवार पर
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