بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۴
उसका नापन के लिए बाल्टी का नहीं बल्कि ड्रम की ज़रूरत होगा। मुसलमानों के अपने बयान के मुताबिक सड़कों पर मुसलमानों का ख़ून बह रहा है, बस्तियां मुसलमानों के ख़ून से सुर्ख हो रही हैं। अब देखिए कि यह सारा ख़ून जो बहाया जा रहा है उसका फ़ायदा क्या है? क्या इसकी वजह से ख़ुदा के बंदे ख़ुदा के दीन में दाख़िल हो रहे हैं? क्या इसकी वजह से इस्लाम के दुश्मन इस्लाम के दोस्त बन रहे हैं? क्या इसकी वजह से ऐसा हो रहा है कि क़ौमें और क़बीले इस्लाम में दाख़िल होकर इस्लाम की ताक़त बन जाएं? ज़ाहिर है कि ऐसा नहीं है। मुसलमानों के ख़ून का सैलाब सौ साल से भी ज़्यादा मुद्दत से बह रहा है। पर एक भी शख़्स नहीं जिसकी रूह को ख़ून के इस दरिया ने पाक किया हो। कोई एक आदमी नहीं जो इस ख़ून की वजह से मुसलमानों के दीन में दाख़िल हुआ हो। कोई एक क़बीला नहीं, जिसने मुसलमानों के इस अमल को देख कर ऐसा किया हो कि वह ख़ुदा की नाफ़रमानी को छोड़ कर ख़ुदा का मोमिन (मानने वाला) और ख़ुदा का मुसलिम (आज्ञाकारी) बन जाए। यह फ़र्क क्यों है? रिसालत के दौर में पानी ने जो नतीजा दिखाया था, बाद के दौर में ख़ून भी वह नतीजा न दिखा सका। इस फ़र्क की वजह यह है कि रसूल का पानी मुहब्बत का पानी था। और मौजूदा मुसलमानों का ख़ून नफ़रत का ख़ून है। रसूल ने इंसान के ऊपर माफ़ी, ख़ैरख्वाही, शफ़क़त, प्यार और मेहरबानी की
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