بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۵
रहा हा वह एक विलियन (एक अरब) मुसलमाना के बावज़ूद सारा दुनियां का कमज़ोर और मग़लूब (प्रभुत्वहीन) मज़हब बना हुआ। हर आदमी में पैदायशी तौर पर अलग तरह की सलाहियतें होती हैं। एक नफ़्से-लव्वामा (ज़मीर, अंतरात्मा) और दूसरी नफ़्से-अम्मारा (अनानियत या अहंकार)। ये सलाहियतें पहले सोई होती हैं। अब अगर आप किसी दूसरे के नफ़्से-लव्वामा को जगाएं तो उसकी शख्सियत का इंसानी जुज़ (मानवीय अंश) आपके हिस्से आएगा, और अगर आप उस नफ़्से-अम्मारा को जगाएं तो उसकी शख्सियत का हैवानी जुज़ (पाभाविक अंश) आपके हिस्से आएगा। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कोशिश हमेशा यह होती थी कि आप आदमी के वजूद के इंसानी हिस्से को जगाएं। इसलिए आप न सिर्फ़ अच्छों के साथ अच्छा सलूक करते थे, बल्कि बुरों के साथ भी आप हमेशा अच्छा सलूक करते थे, इसकी वजह से आदमी की छुपी हुई 'फ़ितरत' जागती और आखिरकार वह इस्लाम कुबूल करके आपका साथी बन जाता था। मौजूदा मुसलमान रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत पर अमल नहीं करते कि 'बुरों के साथ भी अच्छा सलूक करो।' वह हमेशा रद्दे-अमल (प्रतिक्रिया) का तरीक़ा अपनाते हैं। इसीलिए उनका तरीक़ा सिर्फ़ दूसरे की अनानियत और अहंकार को जगाने सबब बनता है। ख़ुदा के बन्दों के लिए उनके पास 'मुहब्बत का पानी' नहीं, अलबत्ता उनके पास 'नफ़रत का ख़ून' काफ़्री मिकदार में मौजूद है, जिसको वे लोगों के ऊपर उंडेलते रहते हैं।
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