Al-Risala · January 2024 · page 8

بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۸

तो उन्होंने उस शक का क़बूल नहा कर लिया, बल्कि उसके लिए रा-रा कर दुआएं कीं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिल कर उसकी सफ़ाई मालूम की। और जब बात साफ़ हो गई तो फिर कोई चीज़ उनके लिए एतिराफ़ (स्वीकार) करने में रुकावट नहीं बनी। उन्होंने न सिर्फ़ खुले दिल से एतिराफ़ किया, बल्कि हर नुक़सान और मुसीबत को बर्दाश्त करते हुए बराबर उस पर क़ायम रहे। यह है हज़रत हम्ज़ा की वह कुर्बानी, जिसके नतीजे में सारी दुनिया के मुसलमान हर हफ़्ते जुमा' के खुतबे में 'सैयदशशुहदा हम्ज़ा' कह कर उनकी दीनी बढ़ाई का एतिराफ़ करते हैं। दावत का काम सबसे ज़्यादा कीमती है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः अल्लाह तुम्हारे ज़रिए से एक आदमी को हिदायत दे दे तो तुम्हारे लिए उन तमाम चीज़ों से बेहतर है जिन पर सूरज तुलूअ (उदय) होता है। (जामिउ बयानिल इल्म व फ़ज़्लिही, हदीस नंबर 774) इजतिमाई ज़िन्दगी हर हाल में ज़रूरी अबुर्द र्दा' कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह कहते सुना : “जिस गांव या जंगल में तीन आदमी हों और वहां जमाअत से नमाज़ न होती हो तो उन पर शैतान हावी हो जाता है। इसलिए जमाअत को

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