بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۹
करत था आपका अहल्या हज़रत आयशा रज़ा अल्लाहु अन्हा न बाद के ज़माने के लोगों से फरमाया:
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तुम लोगों की तरह तेज़- तेज़ नहीं बोलते थे, बल्कि आपके कलाम में ठहराव होता था। आप के पास बैठा हुआ आदमी उसको याद कर लेता था (ज़ादुल- मआद)। एक और रिवायत में ये अल्फ़ाज़ आए हैं:
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस तरह तेज़-तेज़ बातें नहीं करते थे जैसे तुम करते हो, आप इस तरह बात करते थे कि अगर गिनने वाला गिने तो उसको गिन ले। (बुखारी, मुस्लिम) मोमिन का बोलना एक ऐसे शख़्स का बोलना होता है जो अल्लाह से डरने वाला हो। मोमिन को यक़ीन होता है कि उसका हर लफ़्ज़ फ़रिश्ते लिख रहे हैं। वह अपनी कही हर बात के लिए ख़ुदा के यहां जवाबदेह होने वाला है। मोमिन का यह यक़ीन उसके अन्दर ज़िम्मेदारी का एहसास पैदा कर देता है। वह जब बोलता है तो उसको ऐसा महसूस होता है जैसे वह ख़ुदा और फ़रिश्ते के सामने बोल रहा है। यह एहसास उसकी ज़ुबान पर लगाम लगा देता है। वह बोलने से पहले सोचता है। वह जब बोलता है तो अल्फ़ाज़ तोल कर अपने मुंह से निकालता है। ख़ुदा का ख़ौफ़ उससे तेज़-कलामी का अन्दाज़ छीन लेता है।
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