Al-Risala · January 2024 · page 10

بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۱۰

होता है, जिसका नक़्शा हज़रत आयशा का ऊपर वाला रिवायत में नज़र आता ह एक सुन्नत मक्का की फ़तह (8 हिजरी) के बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का से तायफ़ का सफ़र किया। इस सफ़र के दौरान जो वाक़िआत पेश आए, उनमें से एक वाक़िआ वह है जो इन अल्फ़ाज़ में नक़ल किया गया है: फिर आप उस रास्ते में चले जिसे ज़ैक़ा (तंग) कहा जाता था। जब आप उस तरफ़ चले तो आपने उसका नाम पूछा और कहा कि उसका नाम क्या है। आपको बताया गया कि ज़ैक़ा (तंग)। आपने फ़रमाया कि नहीं, बल्कि वह युसरा (आसान) है। (सीरत इबने हिशाम)

यह वाक़िआ बताता है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का तालीम और तरबियत का तरीक़ा क्या था। वह आदमी के तर्ज़-फिक्र और सोचने के अंदाज़ को बदलना था। लोग जिस चीज़ को 'मुश्किल' के रूप में देख रहे हों, उसके बारे में ऐसी नज़र पैदा करना कि वे उसको 'आसानी' के रूप में देखने लगें। आज ज़रूरत है कि पैग़म्बर की इस सुन्नत को ज़िंदा किया जाए। लोगों के सोचने के तरीक़े को बदलना और उनके ज़ेहन को दुरुस्त करना, यही आज करने का सबसे बड़ा काम है, इसी काम के करने पर मुस्लिम मिल्लत का मुस्तक़बिल टिका हुआ है।

‹ Previous page Next page › Contents of January 2024 All issues

Printed page