بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۱۱
दूसरा क़ौमों को अपना शत्रु और प्रातद्वंद्व़ी समझ हुए हैं; इसके बजाए उनके अंदर यह निगाह पैदा करना कि वे दूसरी क़ौमों को ‘मदऊ’ (निमंत्रित) की हैसियत दें और उनके साथ ‘दाईयाना’ यानी आमंत्रण और आवाहन वाला अख़लाक़ बरतें। ख़ुलासा यह कि मुसलमानों के अंदर ऐसा फिक्री इन्क़िलाब (वैचारिक क्रांति) लाना कि वे मौजूदा क़ौमी निगाह को छोड़ दें और चीज़ों को रब्बानी निगाह से देखने लगें। आज सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि उस छोड़ी हुई सुन्नत को दोबारा ज़िन्दा किया जाए। दो इमकानात के दरम्यान रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब दुआ फ़रमाते तो अक्सर इस किस्म के अल्फाज़ फ़रमातेः ऐ दिलों को फेरने वाले, मेरे दिल को अपने दीन पर जमा दे। हज़रत आयशा ने एक रोज़ सुना तो कहाः ऐ ख़ुदा के रसूल, आप यह दुआ बहुत करते हैं। इसकी क्या वजह है? आपने फ़रमायाः हर आदमी का दिल अल्लाह की उंगलियों में से दो उंगली के बीच होता है। जब वह उसको सीधा करना चाहता है तो सीधा कर देता है और जब वह उसको टेढ़ा करना चाहता है तो टेढ़ा कर देता है। (मुसनद अहमद, हदीस नंबर 17630)
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