Al-Risala · January 2024 · page 12

بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۱۲

अल्लाह का मदद ही उसका सही राह पर क़ायम रख सकता है। गैर-ख़ूनी इन्किलाब इन्सान इन्किलाब चाहता है। उसी के साथ वह चाहता है कि यह इन्किलाब ग़ैर-ख़ूनी तौर पर आए। मगर इतिहास बताता है कि कोई भी शख़्स ग़ैर-ख़ूनी इन्किलाब लाने में कामयाब न हो सका। तमाम मालूम इन्किलाब क़त्ल और खून के जंगल को पार करके ही आए हैं। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का लाया हुआ इन्किलाब तमाम मालूम इतिहास का अकेला इन्किलाब है जो सही मानो में ग़ैर-ख़ूनी इन्किलाब (bloodless revolution) है। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अगर इतिहास से हटा दिया जाए तो न सिर्फ़ ग़ैर-ख़ूनी इन्किलाब की यह बात अफ़साना बन कर रह जाती है, बल्कि उसके बाद कोई ऐसी व्यावहारिक मिसाल बाक़ी नहीं रहती जिसकी रोशनी में कोई इन्सान बाद के ज़मानों में ग़ैर-ख़ूनी इन्किलाब की बात सोच सके। फ्रान्स में आधुनिक लोकतांत्रिक इन्किलाब आया। इसमें जनता और राजतंत्र के बीच जो मुक़ाबले हुए उनमें मरने वालों की तादाद 10 लाख तक पहुंच गई। बीसवीं सदी में रूस में कम्यूनिस्ट इन्किलाब आया। उसमें जो लोग मरे और मारे गए उनकी ठीक-ઠીक तादाद मालूम नहीं। फिर भी अन्दाज़ा है कि उनकी तादाद किसी हाल में एक करोड़ से कम नहीं। अमरीकी इन्किलाब (1773-1783) में इससे कुछ कम आदमी मरे। फिर भी इसमें मरने वालों की तादाद 50 हज़ार तक पहुंच गई। विश्व युद्धों का मामला इससे भी आगे है। पहले विश्व-युद्ध में विभिन्न

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