Al-Risala · January 2024 · page 13

بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۱۳

प्रक्रिया में सिर्फ 1018 आदमी मरे, जिनम 259 मुसलमान थे और 759 ग़ैरमुस्लिम। यह तादाद घटना को देखते हुए इतनी कम है कि वह लगभग नहीं के बराबर है। आपके लाए हुए इन्क़िलाब को बेशक पूरे मा'नों में ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब कहा जा सकता है। हर लीडर ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब लाने का दावा करता है। मगर कोई लीडर ग़ैर- ख़ूनी इन्क़िलाब लाने में कामयाब नहीं होता। इसकी वजह क्या है? इसकी वजह यह है कि दुनिया में ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब लाने के लिए खुद अपने आपको खून करना पड़ता है। और यही वह कीमत है जिसके देने के लिए कोई शख्स तैयार नहीं। ख़ूनी इन्क़िलाब टकरार की ज़मीन पर आते हैं और ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब सब्र और संयम की ज़मीन पर, और किसी इन्सान के लिए सब्र से ज्यादा मुश्किल काम इस दुनिया में कोई और नहीं। सब्र की हक़ीक़त झटके को अपने ऊपर लेना है, दूसरे पर डालने के बजाए अपने आप पर सहना है। हक़ीक़त यह है कि लड़ाई के बगैर भी जीत होती है। मगर लड़ाई के बग़ैर जीतने के लिए अपने आप से लड़ना पड़ता है। लोग अपने आप से लड़ नहीं पाते, इसलिए वे लड़ाई के बग़ैर लड़ाई जीतने वाले भी नहीं बनते। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ग़ैर-ख़ूनी इन्क़िलाब लाने में किस तरह कमियाब हुए, इसका अन्दाज़ा आपकी ज़िन्दगी के हालात को पढ़ने से होता है। मक्का में 13 साल तक आपके विरोधियों ने आपको और आपके साथियों को हर तरह की तकलीफें पहुंचाई। उन्होंने अल्फाज़ की चोट भी दी और पत्थर और

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