Al-Risala · January 2024 · page 15

بندہ شدن از بندگان عبید بیاموز

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۴، صفحہ ۱۵

हक़ीक़त का अमली रूप दिखाया है, फिर भी यह कोई सादा बात नहीं। इस क़िस्म की एक घटना को अमली रूप देने के लिए सब्र की ज़रूरत है, और इस दुनिया में बेशक सब्र से ज़्यादा मुश्किल क़ुर्बानी और कोई नहीं। मेआर को बुलन्द करना पुराने ज़माने के अरब में बराबर की अख़्लाक़ियात (नैतिकता) का रिवाज था। उनकी ज़िन्दगी का उसूल यह था कि जो शख़्स जैसा करे उसके साथ वैसा ही किया जाए। यानी अच्छा सुलूक करने वाले के साथ अच्छा सुलूक और बुरा सुलूक करने वाले के साथ बुरा सुलूक। इस्लाम से पहले के ज़माने का एक शायर अपने मुक़ाबिले के क़बीले के बारे में कहता है कि ज़्यादती की कोई क़िस्म हमने बाक़ी नहीं छोड़ी। उन्होंने हमारे साथ जैसा किया था वैसा ही हमने उनको बदला दिया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाए तो आपने अख़्लाक़ के इस उसूल को बदला। बराबरी के अख़्लाक़ के बजाय आपने उनको बुलन्द अख़्लाक़ी की तालीम दी। आपने फ़रमाया कि "जो शख़्स तुम्हारे साथ बुरा सुलूक करे उसके साथ तुम अच्छा सुलूक करो।" (कंजुल उम्माल, हदीस नंबर 6929) एक और हदीस में है:

तुम लोग इम्माआ (मौक़ापरस्त-खुदगर्ज़) न बनो, कि यह कहने लगो कि अगर

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