اختلاف ایک آزمائش
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۵، صفحہ ۱
शब्द इस प्रकार हैं: हज़रत अबू हुरैरा (राज़यल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि पैगंबर- ए-इस्लाम ने कहाः “मनुष्य धातु की तरह हैं, जैसे सोने और चांदी की धातु। जो व्यक्ति जिहालत (अज्ञानता) में बेहतर था, वही इस्लाम में भी बेहतर है, बशर्ते वह समझ हासिल कर लो।” (मुसनद अहमद, हदीस संख्या 10956)
इस हदीस में इंसान के बौद्धिक विकास के चरणों को बताया गया है। पहला चरण वह है जिसमें इंसान जन्म लेता है। दूसरा चरण वह है जो इंसान अपने प्रयासों से बनाता है। तीसरा चरण मारिफ़त (ज्ञान) का है। जब इंसान मारिफ़त के चरण में पहुंचता है, तो वह अपने विकास की अंतिम मंज़िल पर पहुंच जाता है, जिसे इस्लाम कहा गया है। इंसान की स्थिति धातु (मेटल) जैसी है। जैसे लोहा जमीन से निकलता है। प्रारंभिक स्थिति में वह कच्चा लोहा (ore) होता है। इसके बाद उसे पिघलाकर साफ किया जाता है और वह स्टील बन जाता है। फिर वह वह बनाने के मुख्तलिफ़ मरहले से गुजरता है और अंततः एक मशीन का रूप ले लेता है। यानी पहले चरण में कच्चा लोहा, दूसरे चरण में स्टील, और तीसरे और अंतिम चरण में मशीन। इंसान भी ऐसा ही है। जब वह पैदा होता है, तो वह प्रकृति की खदान से बाहर
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