اختلاف ایک آزمائش
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۵، صفحہ ۱۳
जो महिला (या पुरुष) हज़रत खदाजा की तरह सब्र और शुक्र का प्रमाण दें, उन पर अल्लाह के फ़रिश्ते उतरेंगे और इसी दुनिया में उन्हें यह बशारत देंगे कि अगले जीवन में उनके लिए जन्नत, यानी खुशियों और सुकून की अनंत दुनिया तैयार है। हज़रत आइशा बिन्ते अबू बक्र इसी प्रकार की एक और मिसाल आइशा बिन्ते अबू बक्र अस्सिद्दीक़ (वफ़ातः 678 ईस्वी) की है। वे पैगंबर-ए-इस्लाम की पत्नी थीं। पैगंबर-ए- इस्लाम की वफ़ात के बाद वे लगभग पचास साल तक जीवित रहीं। इस दौरान उन्होंने इस्लाम की हिकमत और ज्ञानभरे संदेश को लोगों तक पहुँचाना जारी रखा। उस समय लिखित रिकॉर्ड नहीं होते थे, इसलिए वे पैगंबर की शिक्षाओं का एक जीवंत प्रमाण बनी रहीं। इस्लामी शिक्षा की समझ उनमें इतनी गहरी थी कि पैगंबर के साथी भी दूर-दूर से आकर उनसे धर्म का ज्ञान लिया करते थे। हज़रत आइशा की जिंदगी हर महिला के लिए एक बेहतरीन आदर्श है। उन्होंने बहुत ही साधारण और सादा जीवन जिया। सांसारिक चीजों और आर्थिक मामलों में उन्होंने संतोष (क़नाअत) को अपनाया। इसी सादगी ने उन्हें यह मौका दिया कि वे पैगंबर-ए-इस्लाम की संगत से पूरा लाभ उठा सकें। उन्होंने अपना
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