सच्चा अमल, सच्ची दुआ
الرسالہ، مئی ۲۰۲۵، صفحہ ۱۴
मुहम्मद (स.अ.व.) ने फ़रमाया, "जो इश्वर पर और आख़िरत के दिन पर विश्वास रखता हो, उसे चाहिए कि अपने मेहमान का इकराम करे।" मगर इकराम का अर्थ हरगिज़ तकल्लुफ़ (दिखावा) नहीं। यह एक मानवीय और नैतिक कार्य है, न कि कोई दिखावे की चीज़। मेहमान के लिए तकल्लुफ़ से बचने की सख़्त हिदायत दी गई है। हज़रत सलमान (रज़ि.) ने बताया, "पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने हमें मेहमान के लिए तकल्लुफ़ करने से मना किया।" (शु'ब-उल-ईमान 9155) इसी तरह, एक हदीस में पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने फ़रमाया, "मैं और मेरी उम्मत के परहेज़गार लोग तकल्लुफ़ से बहुत दूर रहते हैं।" (अल-मकासिदुल हसनः, 191) वास्तव में, मेहमान की खातिरदारी में जो तकल्लुफ़ किया जाता है, वह असल में मेज़बान के खुद के सम्मान का एक रूप होता है, न कि मेहमान का सम्मान। एक परहेज़गार व्यक्ति के लिए तकल्लुफ़ जैसी दिखावटी चीज़ का कोई महत्व नहीं होता।
सच्चा अमल, सच्ची दुआ
हर इंसान जो इस दुनिया में आता है, एक निश्चित समय के बाद उसे मरना है और अल्लाह के सामने पेश होना है। इसके बाद अल्लाह उसकी हमेशा की ज़िंदगी के बारे में फ़ैसला करेगा। यह हमेशा की ज़िंदगी या तो जन्नत के रूप में होगी या जहन्नम के रूप में। इसे "नजात" (मुक्ति) कहते हैं।