दुनिया से भरे हुए और दीन से ख़ाली
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۵۲
क़ाज़ी शुरह न कहा, "वह अलग बात है। दुनियावी मामला में इस्लाम का उसूल यह है कि पिता के पक्ष में उसकी सन्तान की गवाही विश्वसनीय नहीं।" हज़रत अली ख़लीफ़ा थे। वह काज़ी को निलम्बित करने का अधिकार रखते थे पर उन्होंने काज़ी के फ़ैसले के आगे सिर झुका दिया और अपना दावा वापस ले लिया। नसरानी यह देखकर हैरान रह गया। वह चीख उठा और बोला, “मैं गवाही देता हूं कि यह पैग़म्बरों के आदेश हैं कि अमीरुल मोमिनीन एक आम आदमी की तरह काज़ी की अदालत में आएं और काज़ी उसके ख़िलाफ़ फ़ैसला करें। मैं गवाही देता हूं कि ख़ुदा के सिवा कोई मा'बूद (उपास्य) नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।" फिर उसने कहा, “यह ज़िरह सचमुच अली की है। एक बार यह अली के ऊंट से गिर गई थी। और मैंने उसे उठा लिया था।" (हिल्यतुल औलिया, खण्ड 4, पृष्ठ 139)
अब हज़रत अली ने वह ज़िरह उसी व्यक्ति को दे दी और उसको और भी सात सौ दिरहम दिए और उसके बाद वह मुसलमान होकर हज़रत अली के साथ रहा, यहां तक कि सिफ़्फ़ैन की लड़ाई में शहीद हो गया। यह घटना उस उसूल की श्रेष्ठतम मिसाल है कि शासक और आम आदमी दोनों
‹ Previous page Next page › Contents of November 2025 All issues