दुनिया से भरे हुए और दीन से ख़ाली
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۵۳
कूफ़ा के बाज़ार की तरफ़ गए। उन्होंने देखा कि एक इसाई ज़िरह बेच रहा हो पास जाकर देखा तो यह वही ज़िरह थी, जो उनसे खो गई थी। हज़रत अली उस समय इस्लामी साम्राज्य के ख़लीफा (शासक) थे। वह चाहते तो उसी समय ज़िरह अपने क़ब्ज़े में ले सकते थे लेकिन उन्होंने अपने आपको कानून से ऊपर न समझा। उन्होंने नस्रानी से कहा, "यह ज़िरह मेरी है तुम इसको लेकर क़ाज़ी (न्यायाधीश) के पास चलो। वह मेरे और तुम्हारे बीच फ़ैसला करेगा। उस समय मुसलमानों के क़ाज़ी शुरैह बिन हारिस थे। दोनों बाज़ार से चलकर क़ाज़ी शुरैह के पास पहुंचे। शुरैह ने क़ाज़ी की हैसियत से पूछा, “अमीरुल मोमिनीन, आप क्या चाहते हैं?" हज़रत अली ने कहा, "यह ज़िरह मेरी है और मुझे वापस दिलाई जाए।" शुरैह ने नस्रानी से पूछा कि "तुम क्या कहते हो ?"
उसने कहा, 'अमीरुल मोमिनीन झूठ बोल रहे हैं। यह ज़िरह मेरी है।" काज़ी शुरैह ने हज़रत अली से कहा, "महज़ आपके दावे के आधार पर मैं ऐसा नहीं कर सकता कि ज़िरह उससे लेकर आपको दे दूं। आप अपने दावे के पक्ष में सबूत लाइये।"
हज़रत अली ने कहा, "शुरैह का निर्देश सही है।" इसके बाद उन्होंने अपने पक्ष में दो गवाह पेश किए। एक अपने गुलाम क़म्बर को और दूसरे अपने लड़के हसन
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