Al-Risala · November 2025 · page 54

जनता और शासक के बीच क़ानूनी बराबरी

الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۵۴

बहस किए बिना उसका मान लिया। उसने तुरन्त फ़ौज का हुक्म दिया कि पूरी फ़ौज समरकंद छोड़कर निकल आए। यह अलग बात है कि इसकी नौबत नहीं आई। समरकंद के लोगों ने जब देखा कि मुसलमान इतने ज़्यादा उसूल पसंद और न्यायप्रिय हैं तो वे हैरान रह गए। इससे पहले कभी उन्होंने ऐसा निष्पक्ष न्याय नहीं देखा था। उन्होंने महसूस किया कि मुस्लिम फ़ौज का आना उनके लिए शुभ है। और यह रहमत का आना है। उन्होंने अपनी मर्जी और ख़ुशी से मुस्लिम हुकूमत को स्वीकार कर लिया। वह कह उठेः स्वागत है। हम आपके प्रशंसक, आज्ञाकारी और फ़रमाबरदार हैं। यह घटना न्याय और इंसाफ़ का जो नमूना पेश कर रही है, उसकी मिसाल पूरे इतिहास में मुश्किल से मिलेगी। इस घटना में न्याय का उसूल अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में और चरम सीमा पर है। इंसाफ़ और न्याय बेशक श्रेष्ठतम मानवीय मूल्य हैं और यह घटना इस मूल्य (कद्र) के सम्मान की बेहतरीन व्यावहारिक मिसाल है।

जनता और शासक के बीच क़ानूनी बराबरी

हज़रत अली बिन अबी तालिब इस्लाम के चौथे खलीफ़ा थे। उन्हें असाधारण

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