Al-Risala · January 2025 · page 2

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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۲

ह कि लागा के बाच सांस्कृतिक फक हो इसका असल कारण यह ह कि हमार समाज के लोग मानसिक तौर पर डायबिटिक हो गए हैं। उनमें शक्कर को ताकत में बदलने की सलाहियत नहीं रही। उनमें यह ताकत नहीं रही कि वे 'कमज़ोरी' को अपनी ताकत बना सकें। सामाजिक जिंदगी में हमेशा ऐसा होता है कि इंसान के साथ नामुनासिब बातें पेश आती हैं। एक इंसान को दूसरे इंसान से शिकायत हो जाती है। किसी के फायदे दूसरे के नफे से टकरा जाते हैं। एक इंसान ऐसे अल्फाज़ कहता है जो सुनने वाले को महसूस होता है कि यह उसकी शख्सियत या समाजी हैसियत पर चोट कर रहे हैं। समाज में इस तरह के वाक्ये पेश आते हैं और हमेशा पेश आते रहेंगे। हमारे लिए यह मुमकिन नहीं है कि हम इन वाक्यों को रोक सकें। लेकिन हमारे लिए यह मुमकिन है कि हम इनसे कोई नेगेटिव (नकारात्मक) असर न लें। एक सेहतमंद इंसान अपने अंदर जाने वाली शक्कर को ताकत में बदल देता है। तब्दीली का यही अमल मानसिक तौर पर भी होना चाहिए। इस दुनिया में बेहतर समाजी जिंदगी बनाने का राज़ यह है कि लोगों की समझ को इस काबिल बनाया जाए कि वे नामुनासिब वाक्यों को अच्छे रवैये में बदल सकें। वे गुस्से के जवाब में माफी पेश करें और बुराई करने वाले के लिए भलाई का तोहफ़ा दें। मौजूदा समाज के लोग मानसिक तौर पर डायबिटिक हो गए हैं। उनकी इस मानसिक

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