Al-Risala · January 2025 · page 11

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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۱۱

इसक अलावा वह ख़ुद बच्चा का नमाज़ की ताकाद करता वह राज़ाना अपन बच्चा को लेकर बैठते। उनको कलिमा और दुआएं याद कराते, उनको बताते कि ख़ुदा की इबादत करो। बड़ों का एहतराम और अदब करो। लोगों के साथ अख़्लाक़ से पेश आओ। वग़ैरह !

मगर उनके बच्चे बड़े होकर वैसे ही शरीर और दुनियादार निकले जैसे आम लोगों के बच्चे होते। इसकी वजह यह थी कि वह साहब अपनी ज़ुबान से तो बच्चों को दीनी तालीम देते और अपने अमल से बेदीनी का नमूना पेश करते। अल्फाज़ के लिहाज से वह दीनदार थे, मगर उन्होंने अपने घर में अमली तौर पर दीनदारी की फ़िज़ा नहीं बनाई। मसलन उन्हें अपने मुहल्ले के एक शख़्स से ज़िद हो गई। यह ज़िद महज़ अहंकार के कारण थी। उनके ख़्याल के मुताबिक़ उस शख़्स ने एक बार उनकी तौहीन कर दी थी। इसके बाद क्रे से उनके अन्दर उसके ख़िलाफ़ इन्तिकामी जज़्बा भड़क उठा। घर में उसकी बुराियां करते। उन्होंने उसको हर तरह बदनाम करने की कोशिश की। उसको नुक़सान पहुंचाने की कोशिशे कीं। यहां तक कि उसके ख़िलाफ़ झूठे मुक़द्मे क़ायम किए, वग़ैरह। यह सिलसिला तक़रीबन पन्द्रह साल तक जारी रहा। बच्चे उन साहब की ज़ुबान से दीन की बातें सुनते। और घर के बिगड़े माहौल की वजह से बेदीनी की फ़िज़ा में सांस लेते और मनोविज्ञान का फ़ैसला है कि जहां इस किस्म का दोरंगापन पाया

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