Al-Risala · January 2025 · page 12

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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۱۲

बनाएंग जस दुनिया का साज़ा-सामान जमा करने के सिवा ज़िन्दगी का कोई मक़्सद नहीं। अल्फ़ाज़ के ज़रिए वे नेकी की चर्चा करेंगे मगर अपनी कमाई को नेकी की राह में देने के बजाय उसको सिर्फ़ बच्चों के दुन्यवी हौसले पूरे करने में ख़र्च करेंगे। यह दीनी तरबियत नहीं, बल्कि दीनी तरबियत का मज़ाक है। दीनी तरबियत दीनी अल्फ़ाज़ बोलने का नाम नहीं, बल्कि दीनी माहौल बनाने का नाम है। जिस घर का अमली माहौल दीन के मुताबिक़ न हो, उस घर में कुछ दीनी बातें बोल कर आप दीनी नतीजा पैदा नहीं कर सकते। हक़ीक़त यह है कि घर की बातचीत, घर का पैसा, घर की दिलचस्पी, घर की सरगर्मी, घर के दिन-रात, हर चीज़ को दीन पर ढालना होगा। उसके बाद ही यह मुमकिन है कि बच्चों के अन्दर दीनी मिज़ाज पैदा हो। क़ौल और अमल यानी कथनी और करनी का यह फ़र्क़ आम है। ऐसी हालत में सवाल पैदा होता है कि इस फ़र्क़ का सबब क्या है। इसका सबब यह है कि बात करना सादा तौर पर सिर्फ़ अल्फ़ाज़ बोलना है, जबकि अमल का ताल्लुक़ दूसरी बहुत-सी चीज़ों से जुड़ा हुआ है। आदमी अगर उन दूसरे पहलुओं का ध्यान रखने के लिए तैयार न हो तो वह कभी अमल का सबूत नहीं दे सकता। एक शख़्स जब स्टेज पर खड़ा होकर बोलता है तो वह बात को बात की हैसियत से कहता है। मसलन वह इस्लाम के नैतिक उसूलों पर बोल रहा हो तो वह किताबों में लिखी हुई बातों को शानदार अल्फ़ाज़ में दोहरा देगा। किताबी मालूमात और अल्फ़ाज़ का ज़खीरा एक अच्छी तक़रीर करने के लिए काफ़ी है।

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