Al-Risala · January 2025 · page 13

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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۱۳

उसके लिए उस अमल का वक़्त आता है कि वह अपना ज़ुबान से यह कह कि “मन ग़लती की।” “ऊपरी तौर पर यह सिर्फ़ चन्द लफ़्ज़ों का बोलना है, मगर इस क़्रिस्म का ‘मानना’ आदमी की पूरी शख़्सियत से जुड़ा हुआ होता है। ऐसी स्वीकारोक्ति अपनी प्रतिष्ठा को ख़त्म करने की तरह है। यही वजह है कि हम यह दृश्य देखते हैं कि दूसरों की ग़लती बयान करने वाले बेशुमार हैं मगर अपनी ग़लती मानने वाला कोई नहीं। आप इस्लाम की महान शख़्सियतों की सच को मानने की घटनाएं अपनी तक़रीर में शानदार तौर पर बयान कर सकते हैं, क्योंकि इससे आपकी अपनी ज़ात पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मगर जब ख़ुद अपनी एक ग़लती को मानने का मामला हो तो उस वक़्त ख़ुद अपनी ज़ात ज़द में आ जाती है। और एक मैदान का कामयाब इन्सान दूसरे मैदान में नाकाम साबित होता है। यही वह ख़ास वजह है, जिसकी वजह से आदमी उसूल को बयान करता है, मगर वह उसूल पर अमल नहीं करता। क्योंकि उसूल पर अमल करते हुए वह महसूस करता है कि उसके स्वार्थों को चोट पहुंच रही है। कहीं उसको अपने अहं पर चोट पड़ती हुई दिखाई देती है। कहीं एक उसूल पर अमल करने का मतलब होता है कि दूसरों की तरफ़ से पेश आने वाली नाख़ुशगवारियों को एकतरफ़ा तौर पर बर्दाश्त कर लिया जाए, बुराई के जवाब में भलाई का रवैया इख़्तियार कर लिया जाए। इसी तरह कभी इसका मतलब यह होता है कि एक मिली हुई चीज़ को बिना शर्त

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