एक बेहतर भविष्य की ओर
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۶، صفحہ ۲
उल्लिखित नाजवाना न अपना कुर्बानी का प्रताकात्मक (symbolic) इज़हार 25 हज़ार पैसों के रूप में किया। 25 हज़ार पैसे खुद असल कुर्बानी नहीं थे, बल्कि वे असल कुर्बानी का सिर्फ एक प्रतीक (token) थे। यही मामला जानवर की कुर्बानी का है। कुर्बानी के अमल में जानवर की हैसियत सिर्फ प्रतीकात्मक होती है। जानवर की कुर्बानी के ज़रिए एक मोमिन (सच्चा ईमान वाला) प्रतीकात्मक रूप से इस बात का संकल्प करता है कि वह इसी तरह अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की राह में पूरी तरह लगा देगा। इसीलिए कुर्बानी के समय यह कहा जाता है:
"ऐ अल्लाह, यह तूने ही दिया था, अब मैं इसे तेरे सुपुर्द करता हूँ।" जहाँ तक कुर्बानी की आत्मा का सवाल है, उसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। यह सामान्य रूप से स्वीकार की गई सच्चाई है कि ऐसी भावना के बिना कभी कोई बड़ा काम संभव नहीं हो पाता। लेकिन जहाँ तक कुर्बानी के बाहरी रूप का संबंध है—यानी जानवर के ज़िब्ह (कुर्बान) करने का—इस पर कुछ लोग संदेह प्रकट करते हैं।
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