ایک قابلِ ذکر واقعہ
الرسالہ، مئی ۲۰۲۶، صفحہ ۵۱
का योग्यता के आधार पर आज का दुनियां में अपना क़ामत वसूल करना चाहते हैं। नए ज़माने में ज़िंदगी के दरवाज़ों के सारे ताले बदल चुके होते हैं। लेकिन वे पुरानी चाबियों का गुच्छा लिए हुए नए तालों पर ज़ोर लगाते रहते हैं। और जब उनकी पुरानी चाबियों से नए ताले नहीं खुलते तो कभी ताला बनाने वाले पर और कभी पूरे माहौल पर नाराज़ होते हैं। जबकि जब ताले बदल चुके हों तो यह कभी नहीं हो सकता कि पुरानी चाबियों से नए ताले खुल जाएँ। वास्तविकता के दौर में जज़्बाती भाषण और लेखन, योग्यता के आधार पर हक़ पाने के समय में आरक्षण की मांगें, रचनात्मक स्थिरता के ज़रिए आगे बढ़ने के दौर में जलसों और जुलूसों के माध्यम से क़ौम का भविष्य तलाशने की कोशिश, सामाजिक आधारों की अहमियत के समय में राजनीतिक सौदेबाज़ी के ज़रिए तरक़्क़ी की योजनाएँ—ये सब इसी की मिसालें हैं। यह पुराने मापदंडों के सहारे आज की दुनिया से अपने लिए ज़िंदगी का हक़ हासिल करने की कोशिश है, जो कभी सफल नहीं हो सकती। ऐसे लोगों का अंजाम आज की दुनिया में यही होता है कि वे नफ़्सियाती (मनोवैज्ञानिक) तौर से बीमार होकर रह जाते हैं। जो कुछ उन्हें अधिकार के आधार पर नहीं मिला, उसे वे अत्याचार का नतीजा मानते हैं—और फिर हमेशा के लिए नकारात्मक सोच के शिकार हो जाते हैं।