अपना देवा के नाम पर बलिदान करने का इरादा किया।
الرسالہ، مئی ۲۰۲۶، صفحہ ۵۵
महान सहाबा का यह घटना हम बताता है कि दीन में जिस चीज़ का "ज़िक्र" कहा गया है, वह असल में क्या है। ज़िक्र केवल ज़ुबान से अल्फ़ाज़ दोहराने का नाम नहीं, बल्कि वह एक अंदरूनी तूफ़ान होता है, जो एक बंदे के दिल में उस वक़्त उठता है जब वह अपने रब को सच्चे दिल से याद करता है। जो व्यक्ति अल्लाह पर सच्चा ईमान रखता हो, जब वह उसे याद करता है, तो उसकी अजमत से उसका दिल कांप उठता है, और उसके सामने पेशी का ख़्याल उसे हिला देता है। उस वक़्त उसकी दिली हालत ख़ुद-बख़ुद शब्दों के रूप में बाहर निकलने लगती है — यही असली ज़िक्र है। ख़ुदा का ज़िक्र असल में ख़ुदा को अपने दिल में उतारने का नाम है — ऐसे अल्लाह को, जिसकी महिमा को पहाड़ भी सहन नहीं कर सकते—उस तूफ़ानी छण में, जो रब्बानी शब्द इंसान की ज़ुबान से निकलते हैं, वही ज़िक्र कहलाते हैं। ज़िक्र का मक़सद कुछ शब्दों को पा लेना नहीं है, बल्कि ख़ुदा को पा लेना है। ख़ुदा की याद या उससे दुआ, इंसान और ख़ुदा के बीच संपर्क का ज़रिया है। जब इंसान दिल से पुकारता है, उसी वक़्त ख़ुदा की तरफ़ से उसका जवाब भी आ जाता है। ह्वेन त्सांग (Hsuan Tsang) एक चीनी बौद्ध साधु था। उसका जन्म 602