Al-Risala · May 2026 · page 58

अपना देवा के नाम पर बलिदान करने का इरादा किया।

الرسالہ، مئی ۲۰۲۶، صفحہ ۵۸

(peaceful) दुनिया बन जाएगा। उस समय शांति का स्थान सामान्य (rule) का होगा और हिंसा का स्थान केवल अपवाद (exception) का। सब्र का हथियार 6 सितंबर 1980 की बात है। श्रीमती कमलेश (22 साल) शाहदरा (दिल्ली) की एक सड़क पर चल रही थीं। उनके गले में सोने की जंजीर थी। अचानक अशोक नाम का एक व्यक्ति जिसकी उम्र 25 साल थी झपटा और श्रीमती कमलेश की जंजीर खींच कर भागा। पुलिस कांस्टेबल किशन चंद त्यागी (42 साल) उस वक़्त ड्यूटी पर घूम रहे थे। किसी ने उनको इस घटना की सूचना दी। वह तलाश करते हुए एक वाल्मीकि मंदिर में पहुंचे, जहां मुजरिम मौजूद था। पुलिस की वर्दी देखते ही वह उठ खड़ा हुआ। किशन चंद ने उसका पीछा किया। मुजरिम के पास एक रिवाल्वर था। उसने फ़ायर किया तो उसकी गोली किशन चंद की आंख के नीचे उनके चहरे और गर्दन को ज़ख्मी करती हुई गुज़र गई। उन्होंने चिल्ला कर कहा, "एक बार तूने मुझे मार दिया, पर दोबारा तू नहीं मार सकता। मुझे मालूम नहीं था कि तेरे पास रिवाल्वर है।" अब वह चौकन्ना हो गए। मुजरिम ने दोबारा गोली चलाई। पर हर बार वह निहायत फ़ुर्ती के साथ बैठ गया और उसके वार को ख़ाली कर दिया। किशन चंद बिना किसी डर के अकेले मुजरिम का पीछे करते रहे, जबकि 'दुश्मन' के पास रिवाल्वर था और उनके अपने पास लाठी भी नहीं थी। दौड़ते-दौड़ते आख़िरकार साढ़े चार फुट की एक चारदीवारी सामने आ गई। मुजरिम उस पर कूद गया। किशन चंद ने भी फौरन छलांग लगाई और दूसरी तरफ़ जाकर उसको पकड़ लिया। "एक सशस्त्र मुजरिम को दौड़ाते हुए आपको डर नहीं लगा?" एक अख़बार के

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