Al-Risala · January 2026 · page 51

زندگی کی تلخیاں

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۵۱

और जो हमारे लिए नहीं वह तुम्हारे लिए भी नहीं।" उमर फ़ारूक का यह सफ़र तमाम दुनिया के शासकों के लिए बेशक एक सर्वश्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत करता है। आख़िरत का ज़िक्र आते ही अपना दावा छोड़ दिया उम्मे सलमा (रज़ि०) कहती हैं कि - मदीना के दो मुसलमान एक पुरानी विरासत का झगड़ा लेकर अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के पास आए। उस मामले में दोनों के पास न तो कोई गवाह था और न सबूत। रसूलुल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया - "तुम लोग अपना झगड़ा मेरे पास लाते हो और मैं भी एक इंसान हूँ, हो सकता है तुममें से कोई अपनी बात ज़्यादा अच्छे ढंग से रखे और मैं उसी हिसाब से फ़ैसला कर दूँ। लेकिन अगर मैंने किसी के हक़ में ऐसा फ़ैसला कर दिया जिसमें मैंने उसके भाई का हिस्सा काटकर उसे दे दिया हो, तो वह उसे न ले। क्योंकि असल में मैंने उसे आग का टुकड़ा दिया है जिसे वह क़ियामत के दिन अपनी गर्दन में लटकाए हुए आएगा।"

यह सुनकर दोनों मुसलमान रो पड़े। दोनों ने कहा - "ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपना हक़ अपने भाई को देता हूँ।" रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया - “जब तुमने ऐसा कर दिया है तो अब जाओ, विरासत को दो हिस्सों में बाँटो।"

‹ Previous page Next page › Contents of January 2026 All issues

Printed page