زندگی کی تلخیاں
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۵۳
वह मामूली हालत में इधर से उधर दौड़ रहे हो। अहन्फ़ ने पूछा कि क्या बात है? हज़रत उमर ने जवाब दिया कि बैतुलमाल (खज़ाने) का एक ऊंट भाग गया है, उसको ढूंढ रहा हूं, उन्होंने कहा, “आप अमीरुल-मोमिनीन हैं। आप खुद क्यों यह कष्ट कर रहे हैं। आप किसी गुलाम को हुक्म दे देते वह इस काम को कर डालता।” हज़रत उमर ने जवाब दिया: “कौन है जो मुझसे बढ़कर गुलाम है।”
सल्तनत का हाकिम होने के बावजूद अपने आपको आम आदमियों जैसा समझना एक बहुत बड़ी शासकीय नैतिकता है। पर इस शासकीय नैतिकता की व्यावहारिक मिसाल इस्लामी इतिहास के सिवा कहीं और नहीं मिलेगी। हज़रत उमर फ़ारूक की ख़िलाफ़त का दौर 634 से 644 ई. तक है। उन्हीं के ज़माने में फ़िलिस्तीन पर विजय हासिल हुई। इस विजय के मौक़े पर फिलिस्तीन के ईसाई अधिकारियों के आमंत्रण पर हज़रत उमर ने मदीने से फ़िलिस्तीन की यात्रा की। यह सफ़र एक महान साम्राज्य के महान सम्राट का सफ़र था। पर वह इतना सादा था कि इससे ज़्यादा सादगी की कल्पना नहीं की जा सकती। अब्दुल्लाह अत्तल ने, जो फ़िलिस्तीन के युद्ध (1948) में शामिल थे, एक किताब लिखी है। उसका नाम है : 'खतरुल यहूदिया अल आलमिया अलल इस्लाम वल-मसीहिया' (इस्лами दुनिया और ईसाईयत को यहूदियत से ख़तरा)। यह किताब दारूल क़लम (क़ाहिरा) से 1964 में प्रकाशित हुई है। अब्दुल्लाह
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