सादा ज़िन्दगी
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۵۴
फिर उन्हान अम्र बिन आस से कहा, “ए अम्र, तुमने कब से लागा का गुलाम बना लिया, हालांकि उनकी मांओं ने उनको आज़ाद पैदा किया था।” (फुतुहू मिस्र वल-मग़रिब, इब्न अब्दुल हुक्म, पृष्ठ 195)
यह घटना आदमी के सम्मान और इंसानी बराबरी की सर्वश्रेष्ठ और अंतिम मिसाल है। इस घटना ने एक इंसान और दूसरे इंसान के बीच के हर तरह के भेद को व्यवहारतः ख़त्म कर दिया। इसने इंसानी न्याय और इंसाफ़ की ऐसी मिसाल क़ायम कर दी, जिसके आगे इंसानी अद्लो-इंसाफ का कोई और दर्जा नहीं।
सादा ज़िन्दगी
इस्लामी ख़लीफ़ाओं के ज़माने में धन और सत्ता, दोनों में बेपनाह वृद्धि हुई थी। इसके बावजूद ख़लीफ़ा बिल्कुल सादा ज़िन्दगी गुज़ारते थे। सभी इतिहासकारों ने इसे माना है। मांटगोमरी वॉट (Montgomery Watt) ने लिखा है कि मुस्लिम ख़लीफ़ा जो एक विशाल साम्राज्य के शासक थे, वे अब भी मदीने में सादा तरीके से रहते थेः The ruler of what was now a vast empire still lived a very simple life in Medina, and had not so much as a bodyguard. The Majesty That Was Islam, (1984)
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