Al-Risala · January 2026 · page 57

सादा ज़िन्दगी

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۵۷

हिन्दुआ म हमन जा अख़्लाक़ और शिष्टाचार पाया वह अख़्लाक़ हमन मौजूदा मुसलमानों में नहीं पाया। इसी तरह उन्होंने बताया कि 1982 में मैं 'तरावीह' सुनाने के लिए बंगलोर गया हुआ था। एक दिन मैं बंगलोर से कोरमहल्ली स्कूटर से जा रहा था। रास्ते में मेरे स्कूटर का पैट्रोल ख़त्म हो गया। कुछ दूर तक मैं स्कूटर को धकेल कर ले गया। फिर सड़क के किनारे नारियल का एक बाग़ दिखाई दिया। उसके अन्दर एक कार खड़ी हुई थी। मैं बाग़ के अन्दर गया। वहां एक हिन्दू बैठा हुआ था। मुझको देखते ही उसने अपने आदमी से कहा कि एक कुर्सी ले आओ। मुझको कुर्सी पर बिठा कर पूछा कि हज़रत क्या काम है? मैंने कहा कि मेरी गाड़ी में पैट्रोल ख़त्म हो गया है। यहां से आठ किलो मीटर दूर जाने पर मुझे पैट्रोल मिल सकेगा। मैं कार देख कर यहां आ गया कि शायद यहां से मुझे पैट्रोल मिल जाए। उस हिन्दू ने फ़ौरन अपने ड्राइवर से कहा कि देखो अगर बाहर पैट्रोल हो तो इन साहब की गाड़ी में डाल दो। और अगर बाहर न हो तो अपनी गाड़ी में से निकाल कर इनको पैट्रोल दे दो। पैट्रोल लेने के बाद मैंने अपनी जेब से बीस रुपए का नोट निकाला, ताकि पैट्रोल की क़ीमत अदा कर दूं। अब हिन्दू फ़ौरन हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। उसने कहा कि हमको माफ़ कीजिए। पैसे की ज़रूरत नहीं। हमको बस आपकी दुआ चाहिए।

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