सादा ज़िन्दगी
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۵۹
رہن وال ها | 7 फ़रवरी 1990 का मुलाक़ात में उन्होंने अपन कुछ अबुभव बताए, जिनमें बहुत बड़ा सबक़ है। 1966 की बात है। मौलाना इकरामुद्दीन साहब ने गंगा को स्टीमर से पार किया। वह बरारी रेलवे स्टेशन पर भागलपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रैन पर सवार हो गए। ट्रैन में भीड़ थी। एक जगह सीट पर डालडा का डिब्बा रखा हुआ था। वह डिब्बे को खिसका कर वहां बैठ गए। थोड़ी देर के बाद एक हिन्दू नौजवान आया। यह डिब्बा उसी का था। वह उसको सीट पर रख कर बाहर चला गया था। जब उसने देखा कि डिब्बा अपनी जगह से हट गया है तो उसने पूछा कि उसको किसने हटाया है? मौलाना इकरामुद्दीन साहब ने कहा कि मैंने हटाया है। यह सुनते ही वह सख़्त गुस्सा हो गया। क्योंकि उसकी आस्था के मुताबिक एक मुसलमान ने उसको छू कर अपवित्र कर दिया था। उसने कहा कि इस डिब्बे में गंगा जल था। इसको लेकर मैं देवघर जा रहा था। इसको तुमने अपवित्र कर दिया। अब वह ले जाने के क़ाबिल नहीं रहा। वह गुस्से में आपे से बाहर था और बहुत गर्म लेहजे में बार-बार कह रहा था कि तुमने मेरे गंगाजल को अपवित्र कर दिया। मौलाना इकरामुद्दीन साहब ने इन बातों का कोई असर नहीं लिया। वह ख़ामोशी से उठ कर खड़े हो गए और सीट नौजवान के लिए ख़ाली कर दी। उन्होंने कहा कि मैं नहीं जानता था कि
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