Al-Risala · January 2026 · page 61

सादा ज़िन्दगी

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۶۱

रूसी भाषा में एक किताब आरर्ता के बारे में छपा है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद मास्को से छपा है। किताब की तफ़सील यह है:

S. Alexiyerich, War's Unwomanly Face, Progress Publishers, Moscow दूसरा विश्व युद्ध (1941) छिड़ा तो रूसी हुकूमत ने अपने नागरिकों से जज़्बाती अपीलें कीं और मातृभूमि (Mother Land) को बचाओ का नारा दिया। इसके असर से जो रूसी नौजवान फौज में भर्ती हुए उनमें आठ लाख औरतें थीं, जिनकी उम्र 15-16 साल के बीच थी। यह किताब इन्हीं औरतों के बारे में जानकारी जुटाती है, जिसमें गहरा सबक़ है। मसलन किताब में बताया गया है कि जंग के बाद ज़्यादातर औरतों ने इस हक़ीक़त को छुपाना शुरू किया कि वे जंग में शरीक हुई थीं। “हमने चाहा कि दोबारा आम लड़कियों की तरह हो जाएं, शादी के क़ाबिल लड़कियां। We wanted to become ordinary girls again. Marriageable girls. किताब की लेखिका जंग में शरीक होने वाली एक पढ़ी-लिखी महिला से मिलीं, जिनका नाम वेरा सफमोवना डोडवा (Vera Safrmovna Davdova) था। उन्होंने जो बातें कहीं उनमें से एक बात किताब के के मुताबिक यह थी कि वह यक़ीन रखती हैं कि जंग में औरतों की प्रतिक्रिया पूरी तरह मर्दों से अलग थी। मर्दों का फ़ैसला किसी तजुर्बे के बारे में ज़्यादा

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