सादा ज़िन्दगी
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۳
किसी भी किस्म की कोई नुमाइशा बात नहीं की गई। मसलन आप का एक बीवी सौदा बिन्त ज़म्आ थीं। हज़रत ख़दीजा की वफ़ात के बाद मक्का में उनके साथ आपका निकाह हुआ। हज़रत सौदा विधवा थीं। आपकी तरफ़ से ख़ौला बिन्त हकीम निकाह का पैग़ाम लेकर गईं। उन्होंने पहले सौदा से इसका ज़िक्र किया। सौदा ने कहा कि अगर मेरा बाप राज़ी हो तो मुझे कोई एतराज़ नहीं। तब ख़ौला ने सौदा के बाप से बातचीत की। उन्होंने इस रिश्ते के लिए 'हां' कर दी। इसके बाद आप सौदा बिन्त ज़म्आ के मकान पर गए और वहां सादा तौर पर निकाह पढ़ा दिया गया। रसूलुल्लाह के सहाबा (साथियों) का तरीक़ा भी हमेशा यही रहा। यहां तक कि सहाबा में जो लोग मालदार थे, उन्होंने भी हमेशा सादा और बेखर्च अन्दाज़ में निकाह किया। मिसाल के तौर पर हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ एक व्यापारी थे। वह उन चंद सहाबा में थे, जो मालदार माने जाते थे। उन्होंने मदीना में एक ख़ातून से निकाह किया। इमाम अहमद ने हज़रत अनस के वास्ते से नक़्ल किया है कि हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ का भाईचारा मदीने में एक ऐसे मुसलमान के साथ था जो बहुत मालदार थे। उन्होंने अपने आधे माल की पेशकश की। लेकिन अब्दुर्रहमान बिन औफ़ ने उनके माल में से कुछ नहीं लिया। उन्होंने मदीने में कारोबार शुरू कर दिया। यहां तक कि वह खुद एक मालदार शख़्स हो गए।
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